बिजनौर। बहुचर्चित प्रबल अग्रवाल हत्याकांड में करीब 14 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद मामले में एक बार फिर नया मोड़ सामने आया है। वर्ष 2012 में हुए इस हत्याकांड में बिजनौर की फास्ट ट्रैक अदालत ने जुलाई 2026 में सात आरोपियों को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। अदालत ने प्रत्येक दोषी पर जुर्माना भी लगाया था।
प्रबल अग्रवाल की हत्या 19 दिसंबर 2012 को बिजनौर के शहनाई बैंक्वेट हॉल में आयोजित अग्रसेन जयंती कार्यक्रम के दौरान हुई थी। अभियोजन के अनुसार, घटना के बाद प्रबल का शव गंगा क्षेत्र में फेंक दिया गया था, जिसे बाद में बरामद किया गया। इस मामले ने उस समय पूरे बिजनौर में व्यापक आक्रोश पैदा किया था।
मामले में अदालत ने संजय गुप्ता, विनय अग्रवाल, अपूर्व अग्रवाल, राहुल गुप्ता, आशीष उर्फ रीशू, निखिल अग्रवाल और अनुज गुप्ता को दोषी ठहराया था। इसके बाद सभी को उम्रकैद की सजा सुनाकर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
इस मुकदमे की सुनवाई लगभग 14 वर्षों तक चली। मृतक प्रबल की बहन प्राची अग्रवाल ने लंबे समय तक कानूनी लड़ाई जारी रखी। अदालत में अभियोजन पक्ष की ओर से कई गवाह पेश किए गए और प्राची अग्रवाल की गवाही को भी मामले में महत्वपूर्ण माना गया।
हाईकोर्ट में कानूनी लड़ाई जारी
उम्रकैद की सजा के बाद मामले से जुड़े विभिन्न पहलुओं को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी कानूनी कार्यवाही जारी है। हालांकि, सातों दोषियों को हाईकोर्ट से जमानत मिलने की बात की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध होने तक इसे अंतिम तथ्य के रूप में प्रकाशित करना उचित नहीं होगा।
दूसरी ओर, प्रबल हत्याकांड से जुड़े कुछ अन्य लोगों को आरोपी बनाए जाने की मांग को लेकर भी हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दाखिल की गई है, जिस पर अगस्त 2026 में सुनवाई का उल्लेख विश्वसनीय मीडिया रिपोर्टों में किया गया था।
14 साल पुराने मामले में हर कानूनी कदम पर नजर
प्रबल हत्याकांड को लेकर बिजनौर में आज भी लोगों की नजर अदालत की आगे की कार्यवाही पर बनी हुई है। जुलाई 2026 में सात आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद मामले ने एक बार फिर व्यापक चर्चा बटोरी थी। अब हाईकोर्ट में होने वाली आगे की कार्यवाही इस मामले की अगली दिशा तय करने में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
नोट: इस खबर में जमानत से संबंधित किसी भी अंतिम दावे को हाईकोर्ट के आधिकारिक आदेश की प्रति/केस रिकॉर्ड से सत्यापित किए जाने के बाद ही अपडेट किया जाना चाहिए। इलाहाबाद हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर न्यायिक आदेश और निर्णय उपलब्ध हैं।







