Edited By: Edvin Masih, District Reporter, South Delhi
नई दिल्ली/ग्रेटर नोएडा।
दिल्ली-एनसीआर में महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बेहद गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। 4 अगस्त 2026 की रात ग्रेटर नोएडा के परी चौक से दिल्ली के कश्मीरी गेट की ओर जा रही एक स्लीपर बस में 16 वर्षीय किशोरी के साथ कथित गैंगरेप का मामला सामने आया है।
पुलिस के अनुसार, किशोरी ने आरोप लगाया है कि बस के चालक और कंडक्टर ने उसे नोएडा सेक्टर-63 पहुंचाने का भरोसा देकर बस में बैठाया और फिर चलती बस में उसके साथ कथित तौर पर दुष्कर्म किया। दोनों आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है और बस को जांच के लिए कब्जे में लिया गया है।
यह घटना इसलिए भी झकझोरती है क्योंकि बस परी चौक से कश्मीरी गेट तक करीब 47 किलोमीटर का सफर तय करती रही। यानी एक नाबालिग लड़की कथित तौर पर बस के भीतर मदद के लिए जूझती रही और वाहन शहर की सड़कों पर चलता रहा।
4 अगस्त की रात क्या हुआ था?
पुलिस के मुताबिक, किशोरी उत्तर प्रदेश के मैनपुरी से नोएडा में अपने रिश्तेदार के घर जाने के लिए निकली थी। रास्ते में वह परी चौक पर उतर गई। उस समय बारिश हो रही थी और अंधेरा भी हो चुका था।
इसी दौरान उसने एक स्लीपर बस को रुकने का इशारा किया। पुलिस के अनुसार, बस के कंडक्टर ने उसे बताया कि बस नोएडा सेक्टर-63 की ओर जा रही है। इस भरोसे पर किशोरी बस में बैठ गई।
जांच के अनुसार, बस में उस समय कोई अन्य यात्री नहीं था। किशोरी ने पुलिस को दिए बयान में आरोप लगाया कि बस के चालक और कंडक्टर ने उसके साथ कथित तौर पर दुष्कर्म किया और विरोध करने पर उसे जान से मारने की धमकी दी।
इसके बाद दोनों ने उसे दिल्ली में कश्मीरी गेट के पास छोड़ दिया।
47 किलोमीटर का सफर और सुरक्षा पर बड़ा सवाल
यह मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं है। इसने सार्वजनिक परिवहन की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
एक ऐसी बस, जिसमें कथित तौर पर एक नाबालिग लड़की के साथ अपराध हो रहा था, ग्रेटर नोएडा से दिल्ली तक करीब 47 किलोमीटर चलती रही। पुलिस ने बाद में रास्ते में लगे CCTV कैमरों और तकनीकी निगरानी की मदद से बस को ट्रेस किया।
रिपोर्टों के अनुसार बस के अंदर लगा CCTV भी काम नहीं कर रहा था। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सार्वजनिक परिवहन में सुरक्षा के लिए बनाए गए नियमों की निगरानी आखिर कितनी प्रभावी है?
निर्भया के 14 साल बाद भी वही सवाल
दिसंबर 2012 की निर्भया घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। उसके बाद महिलाओं की सुरक्षा, सार्वजनिक परिवहन की निगरानी और आपातकालीन सहायता व्यवस्था को लेकर कई बड़े बदलावों की बात हुई।
लेकिन 4 अगस्त 2026 की यह घटना एक बार फिर हमें उसी सवाल के सामने खड़ा करती है—
क्या सार्वजनिक परिवहन में बैठना आज भी किसी लड़की के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं है?
सवाल यह नहीं है कि वह लड़की उस बस में क्यों बैठी।
सवाल यह है कि एक 16 वर्षीय बच्ची को बस में बैठने के बाद सुरक्षित अपने गंतव्य तक पहुंचने का भरोसा क्यों नहीं मिल सका?
सवाल यह भी है कि अगर बस के भीतर कोई लड़की मदद के लिए संघर्ष कर रही हो, तो उसे बचाने के लिए हमारी निगरानी व्यवस्था कितनी जल्दी सक्रिय हो सकती है?
NHRC ने लिया स्वतः संज्ञान
मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने 1 सितंबर 2026 को स्वतः संज्ञान लिया।
NHRC ने दिल्ली और गौतमबुद्ध नगर के पुलिस आयुक्तों तथा मैनपुरी के पुलिस अधीक्षक को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। आयोग ने जांच की स्थिति और पीड़िता को दिए गए किसी भी मुआवजे की जानकारी भी मांगी है।
NHRC ने कहा है कि यदि मीडिया रिपोर्ट में सामने आए आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़ा है।
आरोपी गिरफ्तार, जांच जारी
दिल्ली पुलिस ने मामले में बस चालक कुलदीप और कंडक्टर संदीप को गिरफ्तार किया है। बस को जब्त कर फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है।
पुलिस CCTV फुटेज, तकनीकी निगरानी और बस से जुटाए गए फॉरेंसिक साक्ष्यों के आधार पर घटनाक्रम को जोड़ने में जुटी है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, पुलिस ने कई गवाहों के बयान भी दर्ज किए हैं और फॉरेंसिक रिपोर्ट को जल्द हासिल करने की कोशिश की जा रही है।
दोनों आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) और POCSO Act की संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई की गई है।
सुरक्षा के दावे नहीं, जवाबदेही चाहिए
यह घटना एक और बहस को जन्म देकर खत्म नहीं होनी चाहिए।
CCTV कैमरे, हेल्पलाइन नंबर, महिला सुरक्षा योजनाएं और तमाम सरकारी दावे तभी मायने रखते हैं जब जरूरत पड़ने पर वे किसी लड़की तक समय पर मदद पहुंचा सकें।
एक 16 वर्षीय लड़की को अपने घर से निकलकर बस में बैठते समय यह डर नहीं होना चाहिए कि जिस वाहन को वह अपने गंतव्य तक पहुंचने का साधन समझ रही है, वही उसके लिए खतरा बन जाएगा।
दिल्ली को सिर्फ सुरक्षित होने का दावा नहीं करना है—उसे अपनी बेटियों को सुरक्षित महसूस भी कराना है।
और इस मामले में सबसे जरूरी है कि पीड़िता की पहचान पूरी तरह सुरक्षित रखते हुए जांच निष्पक्ष और तेज हो, आरोप साबित होने पर कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई हो और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की जवाबदेही भी तय की जाए।
क्योंकि निर्भया के बाद हमने बहुत कुछ बदलने की बात की थी। अब सवाल यह है कि जमीन पर वास्तव में कितना बदला है।







